Friday, May 12, 2006

Hai saath tumhara


This poem is for all those Banasthli Vidyapeeth(BV) students who are about to leave their alma mater after finishing their study.. Many of you were together for 14 years, some may be less or or more.. I can feel the fire that is burning inside you before leaving this pioneer institute, which is more than your home.. I wish you all a bright future ahead of your career path and may your friendship bloom even after leaving this place..














चन्द शब्द...

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आप तो इन आँखों के नूर हो, ना बोझिल होने देंगे इन्हें कभी
खुदा-ना-खासता साथ बीच में छोड दें, ऐसे बेगैरत हम भी नहीं !!
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About The Three Girls Picture (thanks to this pic.. I saw it, I wrote it.)

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हमने ये तस्वीर देखी और कहीं खो गये थे
सोचा कुछ लिखूँ पर रो रहे थे
छोड कर जओगी तुम इस गुलिस्तां को
पर कांटे इस दिल में चुभ रहे थे
""
....
Ek Ladki..


/*वो अपने दोस्तों को छोड कर जाने वाली है और
उसका मन आज बार बार कुछ पुरानी यादों में डूब
जाना चाह रहा है, पर कश-म-कश की इस नैय्या
में उसे अपने दोस्तों से बिछड जाने का गम सता रहा है ।*/

....
"
कुछ पलों की ये कहानी
इस अंजुमन की मैं दिवानी

मेरा ऐसा रूप सलोना
मुझ गुडिया से तुम ना डरन

देख मेरे ये नैन दिवाने
रोती नहीं पर भरती हैं आहें

मलती हूँ मैं अपनी आँखें
झूठी हूँ पर डरती हैं साँसें
एक दिन है छोड जाना
इसी अंजुमन में तुम्हें सदा

है शेष पलों की ये कहानी
इस अंजुमन की मैं दिवानी
"
....
/*वो अपने इस अंजुमन को छोड कर जाने की बात
सोच रही है। अब उसके यहाँ से जाने के कुछ
ही पल शेष बचे हैं और उसे अपने दोस्तों
को अलविदा कहना है..*/
....
"

इस बी०भी० की याद सखी रे
मेरे नैनों के किनारे
एक दिन ये छोड देंगी
बनकर आँसू, कह अलविदा रे

तेरा सर मेरे कंधों पे
दे रही हैं ये सदायें
जब छोड जाऊँगी ये गली मैं
देना मुझको तू सहारे

इन अँखियों में है कहानी
इस अंजुमन की मैं दिवानी।
"
....
/*आज वो बी०भी० को छोड कर जा रही है। उसका चेहरा
मुरझा सा गया है। सबकी आँखें इक-दूसरे से
नज़र मिलाने से डर रही हैं। आँसूं ही हैं, छलक
पडे तो दर्द का सागर उसे जाने से रोक ना ले.. वो अपनी
सहेलियों को समझा रही, मना रही है कि मैं कहीं
नहीं जा रही । बस हूँ ना तुम सबकी यादों में। मैं
हूँ ना इस बी०भी० की फ़िज़ाओं में। मैं हूँ ना तुम्हारी
आशाओं में। मैं हूँ ना तुम्हारे होठों के किनारों
में जो यूँ चौडी हो जाती हैं मुझे देख कर*/
....

"
तेरा भोला रूप सखी ये
क्यों नहीं हंसता आज बता रे
कहाँ छोड रही मैं तुझे ए पगली
अपनी यादें, गूँजें इस फ़िज़ा में

हसूंगी मैं हर उस पल ओ बबली
जब याद आयेंगे वो पल सुहाने
दो मोटे मोती से आँसूं गिरे अगर तो
झलक उठेंगे वो याद पुराने



तेरी बन्नी की कहानी
इस अंजुमन की मैं दिवानी।
"
....


/*वो अब बी०भी० के गेट से निकल रही है।
बार-बार मुड कर गेट की तरफ़ देख रही है,
पल पल बढ्ती दूरियाँ उसे उनसे बिछडने का
अहसास दिला रही है, वो अपने दोस्तों की
तरफ़ अपनी कातर भींगी निगाहों से देख रही है
और कहना चाह रही है कि, देख मैं आज जा रही हूँ..
तू मुझे रोक क्यों नहीं रहि.. आज मुझे खींच कर
गले से क्यों नहीं लगा रही.. मुझे तुमसे गुस्सा करना है,
शिकायतें करनी हैं, तू मुझ से लडाई क्यों
नहीं करती, कुछ बोलती क्यों नहीं। उन सडकों
पे इतना पैदल चलवाया है तूने और देख मेरे
पैर आज भी दर्द कर कर रहे हैं।
मैं चाह कर भी तुम्हें पकड नहीं पा रही हूँ..
तू इतनी बेमानी कब से हो गई, क्यों मुझसे
तू रूठ गई.. मुझे रोक लो जाने से..*/

....
"
मुड मुड कर देखे ये निगाहें
जाने कब हों फिर मुलाकातें
भींच मुझे तू गले लगा रे
कुछ मत कह बस शिकवे कर ल



लड मुझसे तू, कह मैं हूँ झूठी
कह तूने मुझे सताया रे
कभी क्लास छुडवायी तूने ओ मोटी
पैदल कितना चलवाया रे

क्यों मेरी बन्नी दूर खडी है
क्यों नहीं करती तू गिला रे
इतने बेमाने तो तुम ना थी कभी
क्यों आज दे रही ये सजा रे

आजा मुझको गले लगा रे
आजा मुझको गले लगा रे
"
....
/*बी०भी० की सडकें आँखों से ओझल हो चुकी हैं
और अब दूर दूर तक उसकी सहेलियां नहीं हैं।
उसकी सांसें तेज हो गई हैं.. शाम और घनी
हो गई है। यह शाम बी०भी० के मैदानों में पेड
के नीचे उस शाख की याद दिला रही है जहां
हम बैठ गप्पें मारते थे। ये सडकें बार बार
मुड कर बी०भी) की तरफ़ जाना चाह रही हैं और
मैं यहाँ अपने दोनों हाथ मोडे आँखों को इस
से ढकने की कोशिश कर रही हूँ।

जैसे एक बच्चा अपनी माँ से गुस्सा हो उससे दूर
भाग जाना चाहता है, वैसे ही मुझे तुम सब पे
गुस्सा आ रहा है, तुम सब क्यों मुझ से रूठ गई हो।
मैंने क्या गलती की कि मुझे जाने दे दिया खुद से
इतनी दूर.. मैं तुमलोगों के बिना कुछ भी तो नहीं..

मेरी आँखें बोझल हो रही हैं और मुझे
नींद आ रही है, पर तुम्हारे वो कन्धे कहाँ
हैं जिनपे मैं अपना सर रखकर सोया करती थी
और तुम मुझे थपकियाँ दिया करती थीं..
तुम मुझे वापस क्यों नहीं बुलाती, मुझे पे अपनी
यादों का पहरा क्यों नहीं लगाती, मुझे बी०भी०
का वो आसमाँ वापस क्यो नहीं दिलाती..*/

....
"
सांसों पे परवान चढी है
छेड रागिनी संध्या आ खडी है
इस बी०भी० की शाम निराली
इन सडकों की मैं दिवानी



आज सब मुझसे क्यों रूठे हैं ऐसे
मैंने की है क्या गिला रे
इक टूटी मूरत मैं तुम बिन
इस ज़मीं की तू आसमाँ रे

मुझको बाहों में सुला रे
थपकियों में गीत सुना रे
वापस मुझे तू फिर बुला ले
यादों का पहरा लगा दे

मुझे आसमाँ दे
आसमाँ दे!!!!
"
...

May the the flower of frienship always bloom and its fragrance bring hapiness to your life.. May you people meet again and you will have same enthu to hug eachother.. May you share the same maggie plate, may you fight again for the last bite, may you have same BC times atleast once in your life.. I wish you all for an alumni meet governed by your institute and hence for few days your banasthli days will be back..